भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उदय एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है, विशेष रूप से उसकी धार्मिक राजनीति के संदर्भ में। भाजपा, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ी हुई है, ने हिंदुत्व की विचारधारा को अपनी राजनीतिक रणनीति का केंद्र बनाया है। यह विचारधारा भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखती है, जहां हिंदू संस्कृति और मूल्य सर्वोच्च हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आने के बाद, भाजपा की इस धार्मिक राजनीति ने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को गहराई से प्रभावित किया है। इस कॉलम में हम भाजपा की धार्मिक राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्रमुख नीतियां, सामाजिक प्रभाव, आलोचनाओं और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भाजपा की जड़ें 1951 में स्थापित भारतीय जनसंघ में हैं, जो आरएसएस के सहयोग से बनी थी। आरएसएस, जो हिंदू राष्ट्रवाद का प्रचार करता है, ने हमेशा से भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना देखा है। 1980 में भाजपा का गठन हुआ, और 1990 के दशक में यह पार्टी राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से प्रमुखता में आई। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने हिंदू-मुस्लिम विभाजन को गहरा किया और भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात में एक मध्यम स्तर के नेता थे, और इस घटना ने हिंदुत्व की राजनीति को मुख्यधारा में ला दिया।
2000 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने गठबंधन सरकार बनाई, लेकिन मोदी के युग में, 2014 से, पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। मोदी, जो आरएसएस के आजीवन सदस्य हैं, ने हिंदुत्व को आधुनिक विकास के साथ जोड़ा। 2019 के चुनावों में, भाजपा ने लगभग आधे हिंदू मतदाताओं का समर्थन प्राप्त किया, जो क्षेत्रीय और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ था। हालांकि, अन्य धार्मिक समूहों जैसे मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों में इसका समर्थन कम रहा।
प्रमुख नीतियां और घटनाएं
भाजपा की धार्मिक राजनीति कई प्रमुख नीतियों में झलकती है। सबसे प्रमुख है राम मंदिर का निर्माण। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, 2024 में अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसे मोदी ने राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बताया। यह घटना हिंदुत्व की जीत के रूप में देखी गई, लेकिन इसने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा की।
एक अन्य महत्वपूर्ण कदम अनुच्छेद 370 का निरसन था, जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था। 2019 में इसकी समाप्ति को हिंदू राष्ट्रवादियों ने भारत की एकता की दिशा में कदम माना, लेकिन आलोचकों ने इसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्र पर नियंत्रण के रूप में देखा। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 ने गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की सुविधा दी, लेकिन मुसलमानों को बाहर रखा, जिससे व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
वक्फ संशोधन अधिनियम और एंटी-कन्वर्जन कानून जैसे कदमों ने मुस्लिम और ईसाई समुदायों को लक्षित किया। भाजपा शासित राज्यों में गौ-हत्या पर प्रतिबंध और लव जिहाद जैसे कानूनों ने हिंदू राष्ट्रवाद को मजबूत किया। 2025 में, भारत हेट लैब की रिपोर्ट के अनुसार, 1,318 घृणा भाषण की घटनाएं हुईं, जिनमें से अधिकांश भाजपा से जुड़े संगठनों द्वारा थीं। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों ने इनमें प्रमुख भूमिका निभाई।
विदेश नीति में भी हिंदुत्व का प्रभाव दिखता है। मोदी सरकार ने इस्लामिक देशों के साथ संबंध बनाए रखते हुए, हिंदू डायस्पोरा को मजबूत किया। हालांकि, आंतरिक नीतियां धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देती हैं।
समाज पर प्रभाव
भाजपा की धार्मिक राजनीति ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है। एक ओर, इसने हिंदू बहुमत में गौरव की भावना जगाई है। राम मंदिर जैसे प्रतीकों ने सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा दिया, और चुनावी सफलताएं इसकी पुष्टि करती हैं। 2019 में, 49% हिंदू मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया। आर्थिक विकास और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं को हिंदुत्व के साथ जोड़कर, पार्टी ने युवाओं को आकर्षित किया।
दूसरी ओर, इसने सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाया है। मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों में असुरक्षा बढ़ी है। लिंचिंग की घटनाएं, मस्जिदों पर दावे और घृणा भाषण ने सामाजिक सद्भाव को क्षति पहुंचाई। 2024 के चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अपेक्षा से कम रहा, जो शायद इस ध्रुवीकरण का परिणाम था। विपक्षी दलों ने भी मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया, जिससे उनकी भागीदारी कम हुई।
शिक्षा और मीडिया में भी हिंदुत्व का प्रभाव है। इतिहास की किताबों में बदलाव और मीडिया में प्रचार ने एक विशेष नैरेटिव को मजबूत किया। हालांकि, आर्थिक मोर्चे पर, मोदी सरकार ने हिंदुत्व को विकास के साथ संतुलित करने की कोशिश की, ताकि निवेश प्रभावित न हो।
आलोचनाएं
भाजपा की धार्मिक राजनीति की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान का उल्लंघन करती है। आरएसएस की विचारधारा मुसलमानों और ईसाइयों को विदेशी आक्रमणों का उत्पाद मानती है, जो समावेशी भारत की छवि को धूमिल करती है। 2014 से, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है, और कानूनों का उपयोग उन्हें हाशिए पर धकेलने के लिए किया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अमेरिका और अन्य देशों ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर चिंता जताई। मोदी के गुजरात दंगों से जुड़े विवाद अभी भी चर्चा में हैं, हालांकि वे कानूनी रूप से निर्दोष साबित हुए। आलोचक कहते हैं कि घृणा भाषण अब शासन की रणनीति बन गया है।
विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस, को भी आलोचना मिलती है कि वह अल्पसंख्यकों का समर्थन करने में असफल रहा, लेकिन भाजपा की राजनीति ने उन्हें मजबूत चुनौती दी है।
निष्कर्षc
भाजपा की धार्मिक राजनीति ने भारत को एक नई दिशा दी है, जहां हिंदुत्व मुख्यधारा बन गया है। यह राजनीति चुनावी सफलता तो लाई, लेकिन सामाजिक एकता को खतरे में डाल दिया। भविष्य में, यदि भाजपा संतुलन बनाए रखती है, तो यह विकास को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन ध्रुवीकरण जारी रहा तो भारत की बहुलवादी छवि प्रभावित होगी। अंततः, सच्ची लोकतंत्र में सभी धर्मों का सम्मान आवश्यक है। भारत को अपनी विविधता को मजबूत करने की जरूरत है, न कि विभाजित करने की।
